Sunday, 15 May 2011

जाने क्यूँ वक़्त हुआ बेवफा...

जीवन जैसे घोर तिमिर,
मीलों लम्बी अँधेरी गुफा...
पग पग पर लगती ठोकर,
जाने क्यूँ  वक़्त हुआ बेवफा...

न कुछ सोचा,न कुछ समझा,
जीवन का दांव लगा डाला..
सबकी खुशियों की खातिर,
आपको अपने मिटा डाला...
जो भी आस लगाईं कभी,
पलक झपकते टूट गयी..
आस लगाते न वक़्त हुआ,
खुशियाँ सारी रूठ गयी...

जीवन जैसे घोर तिमिर....


पंख कटे हम उड़ न पाए,
अभी अभी तो पंख थे आये.
मार के अरमां,पीकर आंसू,
मौत को देखा आस लगाए,
जीवन  से तो ना जीत सके,
पर मौत को भी न रास आये,
दूर हो गए हम सदियों तक,
सालों में जो पास आये....

जीवा जैसे घोर तिमिर,
मीलों लम्बी अँधेरी गुफा,
पग पग पर लगती ठोकर,
जाने क्यूँ  वक़्त हुआ बेवफा...




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